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नवउदारवाद के खिलाफ बढ़ता प्रतिरोध

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सोवियत संघ के विघटन के बाद जो विश्व-अर्थव्यवस्था अस्तित्व में आई, उसे उदारीकरण और वैश्वीकरण के नाम से पहचाना गया. इसका मकसद पूरी दुनिया को एक ऐसे बाज़ार में ढालना था, जो बेहतर तरीके से अमेरिकी हितों की सेवा कर सके और विकासशील तथा अविकसित देशों के सस्ते श्रम को लूटकर अधिक से अधिक मुनाफा पैदा कर सके. अधिकतम मुनाफा अर्जित करने के लिए न केवल सस्ते श्रम को निशाना बनाया गया, बल्कि इन देशों की बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा को हथियाने की “आदिम” प्रक्रिया को भी तेज किया गया और इसके लिए संबंधित देशों के धनाढ्य वर्ग को भी इस लूट का हिस्सेदार बनाया गया. इस लूट को सुगम बनाने के लिए यह दावा और प्रचार किया गया कि एक वैश्विक बाज़ार आम जनता की सभी समस्याओं का समाधान होगा, क्योंकि विश्व स्तरीय बाज़ार उसकी आय को बढ़ाकर उसे एक बेहतर जीवन-स्तर प्रदान करेगा और इससे एक औसत भारतीय एक औसत अमेरिकी के बराबर आ खड़ा होगा.

वर्ष 1990-91 से लागू इन नीतियों को ढाई दशक पूरे हो चुके हैं. उस समय जो वादे और दावे किये गये थे, उसकी हकीकत आज सबके सामने हैं. एक वैश्विक बाज़ार मानव-जीवन की बुनियादी आर्थिक समस्याओं को हल नहीं कर पाया. फलस्वरूप, पूरे विश्व में इन नीतियों के खिलाफ प्रतिरोध आंदोलन तेज हुए हैं. इस प्रतिरोध की गूंज अलग-अलग देश/समाज में अलग-अलग तरीके से हो रही है. कहीं वह राजनैतिक अभिव्यक्ति के रूप में सामने आ रही है — चुनावों में वामपंथी/समाजवादी ताकतों को बढ़त के रूप में, तो कहीं मजदूर/छात्रों के विशाल आंदोलनों के रूप में, जो समाज कल्याणकारी योजनाओं में कटौतियों से त्रस्त हैं. खुद अमेरिका में इसकी गूंज “वाल स्ट्रीट पर कब्ज़ा करो” जैसे आंदोलन के रूप में हुई है, जिसका नारा ही था कि पूंजीवाद को उखाड़ फेंको.

भारत भी इन नीतियों के दुष्परिणामों से अछूता नहीं रहा. हालांकि नवउदारवाद की नीतियों को लागू करने के मामले में वामपंथ को छोड़कर लगभग सभी पार्टियों में एक आम सहमति रही है. इन पार्टियों का जो कुछ भी विरोध दिखा, वह चुनावी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आम जनता को बरगलाकर उनका समर्थन पाने के लिए ही रहा है. लेकिन आर्थिक सुधारों की रफ़्तार को हर आने वाली सरकार ने तेज ही किया है. हाल ही में जीएसटी पर हुई कवायद इसका उदाहरण है.

इन नीतियों का एक प्रभाव तो यही रहा है कि हमारे देश का सकल घरेलू उत्पाद तेजी से बढ़ा है, जिसे सत्ताधारी पार्टियों ने अपनी सफलता के रूप में पेश किया है. लेकिन इसके साथ यह भी सच्चाई है कि देश की संपत्ति गरीबों के हाथों में नहीं, धनाढ्यों के हाथ में ही सिमटती गई है. उदारीकरण संपत्ति और आय के न्यायपूर्ण और समान वितरण की अवधारणा के खिलाफ काम करता है. वह धनाढ्यों के प्रति तो उदार होता है, लेकिन गरीबों के प्रति बेरहम. यही कारण है कि हमारे देश के सबसे धनी 10% लोगों के हाथों में तीन-चौथाई से ज्यादा संपदा जमा हो गई है, जबकि शेष 90% जनता की औसत मासिक आय दस हजार रूपये से भी कम है. सातवें वेतन आयोग ने न्यूनतम 18000 रूपये मासिक आय की जरूरत का आंकलन किया है. ट्रेड यूनियनों का आंकलन 26000 रूपये है. इससे स्पष्ट है कि हमारे देश में अमीर और गरीबों के बीच आर्थिक असमानता की खाई और चौड़ी हो रही है, लेकिन इसे पाटने की कोई नीति सरकार के पास नहीं है.

आय का सीधा संबंध पोषण-स्तर से होता है. नेशनल न्यूट्रीशन मॉनिटरिंग ब्यूरो की रिपोर्ट भी यही बताती है कि वर्ष 1975-79 के स्तर से औसत भारतीय ग्रामीण के पोषण स्तर में 550 कैलोरी याने एक-चौथाई से ज्यादा की कमी आई है. यही कारण है कि ग्रामीण बच्चों और महिलाओं का भारी बहुमत कुपोषितों का ही है.

निजी क्षेत्र में और सरकारी क्षेत्र में भी मजदूर भुखमरी के स्तर पर ही जिंदा है. श्रमिकों की सुरक्षा के लिए जो क़ानून बने हैं, या तो उन्हें ख़त्म किया जा रहा है, या फिर उनके उल्लंघन पर मालिकों को कोई दंड नहीं है. इसका असर केवल औद्योगिक मजदूरों पर ही नहीं पड़ा है, ग्रामीण मजदूरों और किसानों पर भी इसकी बुरी मार पड़ रही है. कानूनन न सही, लेकिन व्यावहारिक रूप से मनरेगा को ख़त्म करने की साजिश हो रही है. बजट आबंटन में कटौती के साथ ही उसके मजदूरी के हिस्से में भी कमी की गई है. राज्यों पर सैकड़ों करोड़ रुपयों की मजदूरी देना बकाया है. मजदूरी भुगतान में भी तरह-तरह की अड़चनें पैदा की जाती है, ताकि कृषि मजदूर मनरेगा से विमुख हो जाएं.

दूसरी ओर, उदारीकरण की नीतियां आम जनता को सब्सिडी देने के खिलाफ है, क्योंकि वह इसे विश्व-बाज़ार के विस्तार में अड़चन के रूप में देखता है. उसे धनाढ्यों को लाखों करोड़ रुपयों की कर-रियायतें देना मंजूर है, उसे यह भी पसंद है कि प्रभुत्वशाली वर्ग बैंकों के लाखों करोड़ रूपये डकार जाएं, लेकिन किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप लाभकारी मूल्य देने की मांग करो या उनको सरकारी और साहूकारी कर्जे से मुक्त करने की बात करो, तो उसे अपने खाली खजाने की याद आती है. संकटग्रस्त किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन न व्यवस्था को और न ही उसके कर्णधारों को कोई कचोट होती है. इस कृषि संकट का एक असर तो कृषि से जुड़े ग्रामीण परिवारों की भूमिहीनता तथा ऋणग्रस्तता के रूप में सामने आया है, जिसका सीधा असर देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता पर पड़ा है. वर्ष 1991 में यह उपलब्धता 510 ग्राम थी, जो आज घटकर लगभग 400 ग्राम ही रह गई है. इसी से जुड़ा खाद्यान्न संकट है, जिसका फायदा जमाखोर उठाते हैं और आम जनता महंगाई के रूप में भुगतती है. कभी दाल, तो कभी शक्कर के भाव आसमान छूते रहते हैं. थोक सूचकांक तो स्थिर रहता है, जिसे सरकार महंगाई-नियंत्रण के रूप में प्रचारित करती रहती है, लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आसमान छूता रहता है, जो वास्तविक महंगाई का प्रतिबिम्ब होता है.

उदारीकरण-वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने बड़े पैमाने पर निजीकरण की प्रक्रिया को भी उन्मुक्त किया है और आज अर्थव्यवस्था का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा, जो इससे अछूता हो. इसने पूरी मानव सभ्यता, उसके मूल्यों और समस्याओं को बाजार में लाकर पटक दिया है. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी मानवीय सुविधाएं भी आम आदमी की पहुंच में नहीं रह गई है. सेंटर फॉर वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश के अव्वल शिक्षा संस्थाओं के स्तर में किस तेजी से गिरावट आ रही है. नेशनल हेल्थ अकाउंट की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि सरकारी फंडिंग भी किस तरह निजी अस्पतालों की ओर मोड़े जा रहे हैं. ये मानव-मूल्यों पर पूंजी-सभ्यता हावी होने के दुष्परिणाम है.

प्रेमचंद ने ‘महाजनी सभ्यता’ के जिन दुर्गुणों को रेखांकित किया था, वह वैश्वीकरण की प्रमुख विशेषताओं में शुमार हो चुका है. लेकिन मानव-सभ्यता ‘उदात्तता’ पर पलती-बढ़ती है. इसलिए पूंजी की (अ)सभ्यता से उसका तीखा टकराव होना स्वाभाविक है. जब पूरी दुनिया में उदारीकरण के खिलाफ संघर्ष तेज हो रहे हो, तो भारत कैसे अछूता रह सकता है?

भारत के ट्रेड यूनियन आंदोलन ने 2 सितम्बर को 16वीं बार देशव्यापी हड़ताल का आह्वान कर दिया है. यह हड़ताल हर बार व्यापक से व्यापक होती गई है. पिछली बार 12 करोड़ लोगों ने इस हड़ताल में हिस्सा लिया था, इस बार 15 करोड़ का दावा है. उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भाजपा के पास भी 17-18 करोड़ लोगों का ही समर्थन है. इस प्रकार, दक्षिणपंथी और वामपंथी-प्रगतिशील ताकतों के बीच एक तीखे टकराव की अभिव्यक्ति यह हड़ताल बनने जा रही है.

लेकिन खतरे केवल आर्थिक ही नहीं है. उदारीकरण की नीतियों ने राजनैतिक स्वायत्तता का भी क्षरण किया है. जब जनता में असंतोष फैलता है, तो उसे दबाने के लिए सत्ता-समर्थक ताकतें धर्म और जाति के नाम पर उन्हें बांटने का खेल खुलकर खेलती है. पिछले दिनों महिलाओं-आदिवासियों-दलितों-अल्पसंख्यकों पर बड़े पैमाने पर हमले हुए हैं और लोगों को सामंती-पुरातनपंथी और कथित राष्ट्रवादी चेतना के आधार पर लामबंद करने की कोशिशें हुई है. इससे हमारे संविधान की बुनियादी अवधारणाओं — धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, समानता व भ्रातृत्व — को ही ठेस पहुंची है. स्पष्ट है कि यदि संविधान नहीं बचेगा, तो एक सार्वभौम राष्ट्र के रूप में हमारा देश भी नहीं बचेगा. इसलिए इस हड़ताल को देश को बचाने के संघर्ष में बदलना जरूरी है.

sanjay.parate66@gmail.com

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1 प्रतिक्रिया

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Jitendra Mathur के द्वारा
September 3, 2016

बिलकुल सटीक विचार हैं आपके । सहमत हूँ मैं इनसे ।


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