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मनरेगा : न रोजगार की गारंटी, न मजदूरी की

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किसी भी क़ानून का क्रियान्वयन सरकार और नौकरशाही की ईमानदारी और चुस्त-दुरूस्ती पर निर्भर करता है. तत्कालीन संप्रग सरकार के समय जो छत्तीसगढ़ मनरेगा के क्रियान्वयन में अव्वल था, वही आज ‘फिसड्डी’ है, तो इसका कारण भी स्पष्ट है कि सरकार में राजनैतिक ईमानदारी बची नहीं और भ्रष्ट नौकरशाही कोई जोखिम नहीं लेना चाहती.
प्रदेश के 57 लाख परिवारों में से लगभग 40 लाख ग्रामीण परिवारों के पास मनरेगा कार्ड हैं, जिनमें 1.13 करोड़ मजदूरों के नाम दर्ज हैं. संगठित क्षेत्र में कोई नए रोजगार पैदा नहीं हो रहे हैं. लगभग एक-तिहाई प्रदेश सूखे की चपेट में होने के कारण कृषि और ग्रामीण व्यवस्था संकट में है. इन ग्रामीण परिवारों की आय 5000 रूपये मासिक से भी कम है और रोजगार के अभाव में अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर पलायन की खबरें आ रही हैं. मनरेगा का सफल क्रियान्वयन इन्हें जीने का सहारा दे सकता है, क्योंकि यह केवल रोजगार की गारंटी नहीं है. गरीबों के लिए मनरेगा की मजदूरी भुखमरी और महाजनी क़र्ज़ से बचाव, शिक्षा, स्वास्थ्य और खेती के लिए पैसों की व्यवस्था की भी गारंटी बनती है. मनरेगा इसीलिए निशाने पर है कि सरकार आम जनता को ऐसी कोई गारंटी नहीं देना चाहती. वह तो बाज़ार की व्यवस्था पर भरोसा करती है, भले ही इसकी कीमत आम जनता को ही चुकानी पड़ती हो.
मनरेगा के प्रति मोदी सरकार का रूख शुरू से ही ‘अच्छा’ नहीं है. बड़े पैमाने पर केन्द्रीय बजट में कटौती हुई है. यही कारण है कि नौकरशाही आज ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से हाथ झाड़ रही है. इसका सीधा असर राज्यों पर पड़ना ही था. केन्द्र सरकार की रिपोर्ट के अनुसार ही, प्रदेश में आज केवल 17% मजदूरों को ही निर्धारित समयावधि के भीतर भुगतान हो रहा है और अपने मजदूरों को देरी से भुगतान करने के मामले में छत्तीसगढ़  देश में दूसरे नंबर का राज्य है. रोजगार उपलब्धता के मामले में भी देश के 29 राज्यों में वह चौथे से 21वें स्थान पर चला गया है और वास्तव में केवल 32% मजदूरों को ही औसतन 30 दिनों का काम दिया जा रहा है. इन ग्रामीण कृषि मजदूरों में 45% आबादी आदिवासियों और दलितों की है, जो सामाजिक-आर्थिक विकास के पैमाने पर सबसे निचली सीढ़ी पर है. लेकिन इस समुदाय के भी केवल 43% लोगों को ही — यह संख्या लगभग 7 लाख होती है — काम मिल रहा है. इस मामले में भी छत्तीसगढ़ का स्थान 16वां है.
विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार लगभग 300 करोड़ रुपयों की मजदूरी देना बकाया है. इसका अर्थ है कि न्यूनतम सात लाख मजदूरों का दो करोड़ कार्य-दिवसों का भुगतान होना बकाया है और कई मजदूरों का दो वर्ष पहले किये गए काम की मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है. बजट के अभाव में मनरेगा के तहत हाथ में लिए गए लगभग 90000 कार्य अधूरे पड़े हैं और इस वर्ष तालाब निर्माण के केवल 3%, आंगनबाड़ी निर्माण के भी केवल 3% और इंदिरा आवास निर्माण के केवल 11% लक्ष्य ही पूरे हो सके हैं.
सरकारी रवैये के कारण ग्रामीणों की दिलचस्पी मनरेगा के प्रति घटी है, क्योंकि न रोजगार की गारंटी हैं और न ही मजदूरी की. मनरेगा अब ‘अविश्वास’ का शिकार हो गया है, जिसके पर्याप्त कारण हैं. एक बार लोगों का विश्वास किसी योजना से  उठ जाएं, तो उसे बहाल करना बड़ा मुश्किल होता है. आने वाली किसी भी सरकार के लिए यह आसान नहीं होगा.

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